Saturday, May 22, 2010

पुल टूट रहे है..........2



अपसंस्कृति की बाढ में, रिश्ते बेगाने लगते है।

इस भीङ में सब चेहरे, बस अनजाने लगते है।।

अपने-अपने  जंगल के,  सब  मोगली  हो गये।

खुद का फलसफा सच्चा, बाकी बेमाने लगते है।।

मसीहा के इन्तजार में, पत्थर हो गई है आँखे।

बेवफा भगवान नहीं, कुछ कर्म पुराने लगते है।।

मानवता दम तोङती नजर आ जाती हर कहीं।

तुम चलो आगे पीछे हम,लोग सयाने लगते है।।

नई सोच,रचनात्मक बातें, है जोश से भरपूर।

उम्मीद मानवता की,कुछ लोग दीवाने लगते है।।

11 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

achhi rachna...

sangeeta swarup said...

रिश्तों पर बहुत अच्छी रचना लिखी है...आज सब रिश्ते बेगाने ही हो गए हैं.....
और जो कुछ उम्मीद लगते हैं वो सच ही दीवाने के अलावा क्या हो सकते हैं....बहुत अच्छी रचना...


कृपया अपने ब्लॉग से ताला हटा लें तो आपकी रचना को चर्चा मंच पर लाया जा सकेगा....लिंक लेने में परेशानी हो रही है....कल तक टला हटा दिया गया तो मंगलवार की चर्चा में चर्चा मंच पर आपकी रचना शामिल हो जायेगी
संगीता

दुलाराम सहारण said...

सटीक अभिव्‍यक्ति। सार्थक सम्‍प्रेषण।

आभार।

pragya pandey said...

aapne achchha likha hai .. badhayi

चैन सिंह शेखावत said...

अच्छी रचना।

रिश्तों के बदलते मूल्यों पर सार्थक अभिव्यक्ति ,बधाई

sangeeta swarup said...

आपकी यह रचना चर्चा मंच पर ली गयी है


http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/163.html

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

समाज के विसंगतियों पर बहुत सुन्दर रचना ...
पर अंत में उम्मीद की बातें अच्छी लगी !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

achhi rachna..doosra sher pasand aayaa..

mrityunjay kumar rai said...

nice expression


http://madhavrai.blogspot.com/

ALOK KHARE said...

ek dam satye baat kahi aapne,

badhai

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com